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संत निरंकारी मण्डल का 70वां तीन दिवसीय समागम 18 नवम्बर से दिल्ली में होगा आयोजित

आध्यात्मिक जगत् में विश्वास की बजाय ‘श्रद्धा’ शब्द का प्रयोग किया जाता है

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Sant Nirankari Mandal
Sant Nirankari Mandal

NEW DELHI: संत निरंकारी मण्डल के मेम्बर इंचार्ज प्रेस एवं पब्लिसिटी किरपा सागर और राकेश चौधरी ने बताया कि संत निरंकारी मिशन द्वारा 70वां वार्षिक संत समागम 18, 19 व 20 नवम्बर 2017 को दिल्ली में आयोजित होगा. समागम में ‘निराकार-सहज जीवन का आधार।’ पर जोर दिया जायेगा.

उन्होने बताया कि समागम मे भक्तो को भक्ति मे विश्वाश के बारे मे बताया जायेगा. विश्वाश एक ऐसा शब्द है जिससे सभी परिचित हैं चाहे वह धनवान् हो या निर्धन, शिक्षित हो या अशिक्षित, शहरी हो या ग्रामीण सभी जानते हैं कि विश्वास संसार के हर रिश्ते का एक अनिवार्य अंग ही नहीं उसकी सफलता का प्रमुख द्वार है.

ईश्वर के साथ हमारा भक्ति का नाता है. प्रेम के साथ-साथ विश्वास भक्ति का एक अनिवार्य अंग है. आध्यात्मिक जगत् में प्रायः विश्वास की बजाय ‘श्रद्धा’ शब्द का प्रयोग किया जाता है. भक्ति में जब हम निराकार प्रभु परमात्मा से प्रेम करना चाहते है तो साकार सत्गुरु, ब्रह्मज्ञानी संतों अथवा इसके बन्दों को माध्यम बना लेते हैं परन्तु श्रद्धा सीधे ही निरंकार में व्यक्त करते हैं. श्रद्धा में एक अवस्था ऐसी भी आ जाती है, जब भक्त और भगवन्त एक हो जाते हैं और भक्त निराकार से वह नोंक-झोंक कर जाते हैं जो साधारणतः प्रेम-संबंध में होती है.

विश्वास हमारा भाग्य बदल देता है जीवन में क्रांति लाने का कारण बन जाता है। कहा जाता है कि एक अंधा व्यक्ति हज़रत ईसा मसीह जी के पास आया और कहने लगा – ’’प्रभु मेरी आँखों पर हाथ फेर दो मुझे विश्वास है कि मुझे मेरी नज़र मिल जायेगी।’’ उन्होंने लाख मना किया कि यह शक्ति मेरे पास नहीं है परन्तु नेत्रहीन व्यक्ति यही कहता रहा कि मुझे विश्वास है कि आपके हाथ फेरने से मुझे मेरी नज़र मिल जायेगी. अंत में हज़रत ईसा मसीह जी मान गए और जैसे ही उन्होंने उसकी आंखों पर हाथ फेरा उसको दिखाई देने लगा और वह कह उठा कि देखा प्रभु, मुझे विश्वास था कि आपके हाथों में यह शक्ति है. प्रभु बोले – यह मेरी शक्ति का नहीं तुम्हारे विश्वास का चमत्कार है. इस तरह विश्वास हमारा भाग्य बदल देता है.

विश्वास हमारे व्यक्तिगत अनुभव का परिणाम होता है. किसी के कहे-सुने पर विश्वास करना तो अंध विश्वास ही कहलाता है जो व्यक्ति को लाभ कम हानि अधिक देता है. हमारा ज्ञान, भक्ति सब व्यक्तिगत होते हैं. सेवा, सत्संग, सुमिरण हमारा अपना-अपना होता है.

विश्वास हमें दूसरों के निकट होने का साधन बनता है. संतों भक्तों का मानना है कि हम सभी पर विश्वास करें और इस बात के लिए भी तैयार रहें कि हो सकता है उनमें से कोई छल करने वाला भी निकल आए. परन्तु यह नीति उस नीति से कहीं बेहतर है जिसमें हम किसी पर भी विश्वास न करें और किसी से भी धोखा न खायें.

संत निरंकारी मिशन में हमें प्रेरणा दी जाती है कि हम संतों का संग करें ताकि हमारा ईश्वर प्रभु परमात्मा पर विश्वास बना रहे और इसके दिव्य गुणों का लाभ हम अपने सामाजिक अथवा सांसारिक जीवन में भी प्राप्त कर सकें.

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