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भाजपा के खिलाफ 25 साल बाद फिर ‘दोस्त’ बने सपा और बसपा

गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा उपचुनाव में बसपा का सपा को समर्थन विपक्षी एकता के बीजारोपण की कोशिश है.

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by- भरत मौर्या

नई दिल्ली: बसपा गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा उपचुनाव में सपा का समर्थन करेगी दोनों क्षेत्रों में बसपा के जोनल कोआर्डिनेटरों नें रविवार को अलग-अलग बैठक कर सपा प्रत्याशियों को समर्थन देने की घोषणा की.

गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीटें योगी आदित्यनाथ और उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के इस्तीफे से खाली हुई है.
कोआर्डिनेटरों ने कहा कि पार्टी नें ये फैसला इसलिए लिया है क्योंकि बसपा कार्यकर्ता भाजपा को हराना चाहते हैं.

सपा-बसपा 25 साल बाद किसी चुनाव में एक साथ आई है इससे पहले 1993 में दोनों ने गठबंधन करके विधानसभा का चुनाव लड़ा था.

मायावती ने एक तरफ गठबंधन से इनकार किया तो वही दूसरी तरफ विकल्प भी खुले रखे-
बसपा सुप्रीमो मायावती ने रविवार को सपा के साथ गठबंधन से इंकार किया उन्होंने कहा 2019 के लोकसभा चुनाव में किसी तरह के गठजोड़ की बातें बेबुनियाद है, उन्होंने कहा गोरखपुर और फूलपुर में बसपा चुनाव नहीं लड़ रही है इसलिए पार्टी नेताओं को निर्देश दिए गए हैं कि भाजपा के खिलाफ मजबूत प्रत्याशी का समर्थन करें.
हालांकि मायावती नें भविष्य में गठबंधन के लिए संकेत दिए और कहा कि बसपा किसी दल से तभी गठबंधन करेगी जब उसे समझौते में सम्मानजनक सीटें मिलेंगी.

राजनीतिक जानकारों की माने तो इस समर्थन के दूरगामी मायने निकाले जा सकते हैं. गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा उपचुनाव में बसपा का सपा को समर्थन विपक्षी एकता के बीजारोपण की कोशिश है. नतीजे पक्ष में आए तो माया और अखिलेश की दोस्ती परवान चढ़ेगी नहीं आए तो यहीं पर गठबंधन की सभी अटकलों को विराम लग जायेगा.

मायावती की अखिलेश यादव को समर्थन देने के ये हैं कारण है-
माना जा रहा है कि मायावती का का उपचुनाव में सपा को समर्थन देने का यह कदम समर्थन के बहाने खुद या फिर भाई आनंद को राज्यसभा भेजने की तैयारी है.
चर्चा है कि बसपा सुप्रीमो मायावती या उनके भाई आनंद इसी महीने होने वाले चुनाव में राज्यसभा जा सकते हैं. राज्यसभा भेजने के के लिए उनके पास मत कम पड़ रहे हैं इसीलिए मायावती की चाहत है कि राज्यसभा चुनाव में सपा अपने अतिरिक्त मत बसपा प्रत्याशी को दे.
दूसरा बड़ा कारण मायावती का दलित वोट सहेजने की कोशिश है. 2014 के लोकसभा चुनाव फिर 2017 के विधानसभा चुनाव में जिस तरह दलित वोट भाजपा की तरफ आकर्षित हुआ उससे मायावती की चिंता बढ़ गई है. मायावती इसी बहाने अपने परंपरागत वोटरों पर खुद की पकड़ का टेस्ट करेंगी और आगे आने वाले चुनाव में मुकाबले की रणनीति बनाने की कोशिश करेंगी.

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