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क्या बीजेपी के ‘अच्छे दिन’ अब ख़त्म हो रहे हैं?

कई सहयोगी दल बीजेपी का साथ छोड़ चुके हैं, कुछ साथ छोड़ने का मन बना रहे हैं. जो इनमे से कुछ नहीं कर रहे वो आंख ही दिखा रहे हैं.

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नई दिल्ली: क्या देश में अब नरेन्द्र मोदी की ‘लहर’ और बीजेपी में उनकी ‘स्वीकार्यता’ ख़त्म हो रही है. जिस तरह कुछ दिनों से बीजेपी के ‘अपनें’ नेता बगावती हो रहे हैं और उसके सहयोगी दलों का रुख बीजेपी के प्रति बदल रहा है, उससे यह सवाल खड़े हो रहे हैं कि क्या लोगों के अच्छे दिन लाने का दावा करने वाली बीजेपी के बुरे दिन अब शुरू हो गये हैं? पिछले कुछ दिनों के घटनाक्रम पर अगर नजर डालें तो कुछ ऐसा ही देखने को मिलता है.

नरेन्द्र मोदी, प्रधान मंत्री

लोकसभा चुनाव से पहले का वक्त याद करिए देश में हर तरफ सिर्फ मोदी का नाम और ‘लहर’, बीजेपी में सिर्फ एक नाम ‘मोदी’ जिस नाम को छोटे कार्यकर्ता से लेकर बीजेपी के बड़े दिग्गजों तक का समर्थन प्राप्त था, सबकी स्वीकार्यता थी. आज मोदी सरकार के लगभग चार साल हो रहे हैं लेकिन स्थितियां बदल चुकी हैं.

 

आज बीजेपी में के ‘अपनों’ के ही तेवर बगावती हो चले हैं:

शत्रुघ्न सिन्हा बीजेपी में असंतुष्ट हैं, सिन्हा लगातार बीजेपी और मोदी के खिलाफ बयानबाजी कर रहें हैं.  शत्रुघ्न की तरह ही बीजेपी के एक और बड़े नेता यशवंत सिन्हा भी मोदी के खिलाफ बगावती रुख अख्तियार किये हुए हैं. शत्रुघ्न सिन्हा और यशवंत ने विपक्षी दलों के साथ मिलकर सरकार की नीतियों के खिलाफ लड़ने के लिए एक नया मोर्चा ‘राष्ट्र मंच’ बना लिया है.

शत्रुघ्न सिन्हा और यशवंत सिन्हा, फेसबुक

हरियाणा के कुरुक्षेत्र से सांसद राजकुमार सैनी तो फिलहाल बीजेपी में है लेकिन उन्होंने ऐलान कर दिया है कि वो नई पार्टी बनाएंगे और बीजेपी के खिलाफ हरियाणा की सभी विधानसभा और लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ेंगे.

 

 

सहयोगी दलों का रुख बीजेपी के प्रति बदल रहा है:

कई सहयोगी दल बीजेपी का साथ छोड़ चुके हैं, कुछ साथ छोड़ने का मन बना रहे हैं. जो इनमे से कुछ नहीं कर रहे वो आंख ही दिखा रहे हैं.

 

बीजेपी के कई सहयोगी दलों का बीजेपी से मोहभंग हो गया है. करीब दो दशकों से एनडीए में शामिल रही शिवसेना ने सहयोगी दलों की उपेक्षा का आरोप लगाते हुए 2019 का चुनाव अकेले लड़ने का ऐलान कर चुकी है.

 

हाल ही में चंद्रबाबू नायडू की पार्टी टीडीपी ने भी एनडीए से चार साल पुराना अपना नाता तोड़ लिया. तेलगू देशम पार्टी ने न सिर्फ बीजेपी से अपना नाता तोडा बल्कि अविश्वास प्रस्ताव के लिए नोटिस भी दिया है.

चंद्रबाबू नायडू ,टीडीपी

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी भी एनडीए के खेमें से निकल कर महागठबंधन खेमें की तरफ चले गए हैं.

 

राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री उपेन्द्र कुशवाहा की भी एनडीए से अलग होने की चर्चाएं तेज हैं, हालांकि उपेन्द्र कुशवाहा ऐसी खबरों को बकवास बताते रहें हैं. बिहार में ही बीजेपी के एक और सहयोगी लोक जन शक्ति पार्टी के राम विलास पासवान ने भी बीजेपी को अपनी ‘अल्पसंख्यक विरोधी’ छवि सुधारने की सलाह दी है.

 

उत्तर प्रदेश में बीजेपी की सहयोगी ओम प्रकाश राजभर भी बीजेपी और उत्तर प्रदेश सरकार पर सहयोगी दलों और पिछड़ों व दलितों की उपेक्षा का आरोप लगाते रहे हैं. वर्तमान सरकार के खिलाफ राजभर कई बार बयान दे चुके हैं.

 

उप चुनावों में बीजेपी को हारती चली जा रही है, गोरखपुर जैसे गढ़ में उसको हार का सामना करना पड़ा:

2014 के लोकसभा चुनाव के बाद जिस किसी कारण से कहीं भी लोकसभा उपचुनाव हुए हैं उनमें से अधिकतर चुनाव बीजेपी हार गई है. राजस्थान के उप चुनावों में कांग्रेस से हार के बाद बीजेपी को अपने गढ़ गोरखपुर में समाजवादी पार्टी से करारी हाल झेलनी पड़ी है. गोरखपुर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की छोड़ी हुई सीट थी, उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के इस्तीफे के बाद खाली हुई फूलपुर सीट पर हुए उप चुनाव में भी बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा है. हालांकि गुजरात और हिमाचल प्रदेश का चुनाव जीतेने के बाद नागालैंड, त्रिपुरा और मेघालय राज्यों के विधानसभा चुनावों में बीजेपी ने जीत दर्ज कर अपनी सरकार भी बनाई है.

योगी आदित्यनाथ और केशव प्रसाद मौर्य, फ़ाइल फोटो

पिछले घटनाक्रमों पर अगर निगाह डालें तो जिस तरह से बीजेपी के अपने ही उसे बगावती तेवर दिखा रहे हैं, जिस तरह एक -एक सहयोगी नाराज होकर साथ छोड़ रहें हैं तो ऐसा लगता है कि बीजेपी के वो ‘अच्छे दिन’ अब नहीं रहे.

 

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